Monday, April 26, 2010

मैं और अंधी दौड़

चला  जा  रहा  हूँ   धुंधले   जीवनपथ   पर
आशाओं   के  घोड़ो  पर  ,इच्छाओ  के  रथ  पर
बह  रहा  हूँ ,  बिना  किनारे  की  नदी  में
दौड़  रहा हूँ,   बिना  मंजिल  की  दौड़  में |

 पर  मन  कहता  है  रुक  बाबरे ,महसूस  कर  सर्द  दूब  को
छू  किसी  जीवन  तार  को  , महसूस   कर  प्रकृति  रूप  को
चल  छोड़  भाग  मिथ्या  जीवन  को , लौट  चल  अपने  गाँव  में ...
सुबह  सुहानी  ,शाम सुरीली , नीद  ले  रात   की  बाँहों  में |

छोड़  दे  मशीनों   की  नगरी  , लौट  जा  इंसानों  में ..
चल  उतार  नकली  मुखोटा  , वापस  जा  जाने  पहचानो  में ...
भाव  जहा  दिखे  चेहरों   में , फूल  खिले  सच्ची  मुस्कानों  में |

चलते  चलते  सांझ  हो  जाएगी  , मंजिल  उतनी  ही  दूर  रहेगी |
ढलते  ढलते  शाम  आएगी , खुशी  उतनी  ही  दूर  रहेगी |

ये  मृग त्रष्णा   है  अरे  बाबरे  ,इतना  नहीं  समझ  आता
जो  उलझा  है  उलझ  गया  है , निकल  ना  इससे  कोई  पाता
लौट  जा  गाँव  अपने ,जीवन  तुझे  जहा बुलाता
सुबह  का  भूला  लौट  आये  तो  ,बुद्धू  नहीं  कहलाता |

2 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

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