Monday, April 5, 2010

सपनो की दुनिया

इस बार अप्रैल का महिना बड़ा ही रूमानी है|
जहाँ एक तरफ सुदूर पूर्व सिंगापुर जाने के सपने लेकर मन का तार तार गा रहा है|
वही दूसरी और बरसो से सूने पड़े हृदय में प्रेमबीज का अंकुरण हो जाने से समां और भी रूमानी हो चला है ....

हकीकत  से  दूर  आजकल  ख्वाबो  की  दुनिया  में  जी  रहा हूँ|
सब  कुछ  अच्छा  अच्छा सा  लगने  लगा  है,जीवन रस लौट आया है , प्राण रसमय है |
बरसो  बाद  मन  कल्पनाओ   की  लम्बी  लम्बी  छलांगे मार रहा है |

सिंगापुर परियोजना के बारे में:
सोचा  सिंगापुर  जाने  से  पहले  एक  बार  गाँव  हो  आऊ|
गाँव  पहुचने  से  पहले  ही  मेरे  सिंगापुर  जाने  की  खबर  जंगल में आग की तरह फ़ैल चुकी थी|
हमारे  पूज्य  पिता  जी  और  माता  जी  ने  कोई  कसर  नहीं  छोड़ी  और  ये  सुनिश्चित  किया  कि  गाँव  का
हर  व्यक्ति  इस  बात  से  वाकिफ  हो  कि  उनका  बेटा सिंगापुर  जा रहा है|
उनकी  आँखों  की  चमक  देखते  ही  बनती  है |
उन्हें  इस  बात  से  कोई  मतलब  नहीं  कि  इस सिंगापुर परियोजना कार्य का मेरे career को  लेके  क्या  महत्त्व  है
या  इसका  कुछ  धन  सम्वन्धी  लाभ  भी  है|
उनका  एक  मात्र  लक्ष  ये  सुनिश्चित  करना  है  के  प्रसिद्धी  के  मामले   में  गाँव  में  उनके  बेटे सबसे  ऊपर  रहे ...

पर  गाँव  वालों  के  सीमित  ज्ञान  के  चलते  इस  बड़ी  खबर  का  वो  प्रभाव  नहीं  दिखाई  पड़ा  ,जिसकी मैंने  कल्पना  की  थी |
गाँव  के  काफी  लोग  ये  समझ  बैठे  है  कि  मेरा  ट्रान्सफर  हो  रहा  है  और  मैं  गुडगाँव  से सिंगापुर  नाम  की  किसी  दूसरी  जगह  पे  जा  रहा  हूँ  ..
उनका  सहज  ज्ञान  सिंगापुर  को विदेश  नहीं  मानता |उन्हें  लगता  है  कि  सिंगापुर  कही  हिन्दुस्तान  में  ही  है  ,जैसे  अपना  हसनपुर  वैसे  ही  सिंगापुर :).
नाम  के  अंत  में  लगा  "पुर" उनकी  सहज्व्रती  को  सिंगापुर  के  हिन्दुस्तान  में  ही  होने  का एहसास  कराता  है |
मुझे  कई  लोगो  को  बताना  पड़ा  कि  सिंगापुर  समंदर  के  पार  है  और  हवाई  जहाज  से  जाना  पड़ता  है  , तब  कही  जाके  में  उनके  चेहरे  पे  उभरे  वो  रोमांचकारी  भाव  देख  पाया  , जिनकी   मैंने  सदा से  ही  कल्पना  की  है ..
गाँव  वालो  के  सरल  सहज  स्वभाव  और  सिंगापुर  को  लेके  टिप्पड़ियो  से  मन  गदगद  है|
खैर,  देखते  है  , मिशन  सिंगापुर  में  आगे  क्या  क्या  होता  है ...

बाबरा मन:
अपने लगभग तीन साल के IBM  के कार्यकाल में , लंच ब्रेक की भीड़ में मैंने उस मासूम चेहरे को ना जाने कितनी
बार देखा होगा...
पर पिछले महीनो से ना जाने ऐसा क्या हुआ , के वो चेहरा कुछ ख़ास लगने लगा है..
मन तरंगित है और झूम झूम के गा रहा है " सैया , तू जो छु ले प्यार से .आराम से मर जाऊ.."
हालाँकि मन के किसी कोने से बड़ी ही तार्किक आवाज़ आती है , कि बेटा इस इकतरफा प्यार का हश्र भी वही
होगा जो हमेशा से होता आया है...यानि की शुन्य ..
पर मन है कि रमता जोगी बनने को आतुर है..
उस श्वेतवरनी , मनहरनी बालिका ने मन के जंग लग चुके तारो को झंकार दिया है |

तमाम एक्सपर्ट्स की राय ली जा चुकी है..किसी ने हर रोज़ "गुड मार्निंग" मेल भेजनी की राय दी है ..
तो किसी ने हमारी पर्सनालिटी को आकर्षक बनाने को ढेरो नुक्शे सुझाये है...

खैर , हमने सभी रायो को दरकिनार करते हुए अपने पागल मन को यु ही अपने सपनो के रथ पे बेलगाम छोड़ दिया है|
सपनो की दुनिया हकीकत की बोरियत और तनाव से भरी दुनिया से कही बेहतर जो है...

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