Tuesday, February 16, 2010

उड़ने दो निराकार गगन में

अपनी पहली उड़ान पर कवि हृदय से फूटी कुछ पंग्तिया ..

उड़ने दो निराकार गगन में
श्वेत श्याम बदली के ऊपर
बिना राग फैली लाली पर
बिना वृक्ष ऊगी बादल-डाली पर
फूला  नहीं समाता तन में
उड़ने दो निराकार गगन में!
स्मृति के पंखो को फैलाकर
सुख-दुख के झोंके खा-खाकर
ले अवसर उड़ान अकुलाकर
हुआ  मस्त ये प्राण  लगन में
उड़ने दो निराकार गगन में!

जाने दो पर्वत से ऊपर
लौटू मैं तारो को छूकर 
मिल आऊ सागर से जाकर
लौटू मस्त बादल सा इतराकर
रह न जाये प्राण किसी बंधन में
उड़ने दो निराकार गगन में !

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